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अयोध्या भूमि विवाद मामले पर पांचवे दिन की सुनवाई खत्म, वकील सीएस वैद्यनाथन ने पेश की मंदिर की दलीलें


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अयोध्या भूमि विवाद मामले पर बीते चौथी बार सुनवाई हो चुकी है और इस मामले में पाँचवे दिन की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को हुई है। इस दौरान रामलला विराजमान की ओर से वकील सीएस वैद्यनाथन ने मंदिर के अस्तित्व की दलीलें पेश की है। वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में विवादित जगह पर मंदिर होने का जिक्र हुआ है। हाईकोर्ट के जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि यह मस्जिद मंदिर के टूटे-फूटे हिस्से पर बनाई गई है। बेंच ने पिछली सुनवाई में रामलला के वकील से पूछा था-

क्या श्रीराम का कोई वंशज अयोध्या या दुनिया में है?

वैद्यनाथन ने बेंच से कहा कि 1949 में मूर्ति रखे जाने से पहले भी जन्मभूमि हिन्दुओं के लिए पूजनीय थी। सालों से हिंदू वहां पर दर्शन के लिए आते हैं। किसी स्थान के पूजनीय होने के लिए सिर्फ मूर्ति की जरूरत नहीं है। हम गंगा और गोवर्धन पर्वत का भी उदाहरण ले सकते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में लिखा है कि 1949 के बाद बाबरी मस्जिद में कभी नमाज अदा नहीं की गई। अयोध्या मामले में गवाह हाशिम अंसारी ने कहा था कि अयोध्या हिंदुओं के लिए वैसे ही पवित्र है जैसे कि मुसलमानों के मक्का है।

कोर्ट ने पूछा- राम का जन्मस्थान कहां हैं?
मंगलवार को सुनवाई के दौरान रामलला के वकील एससी वैद्यनाथन ने अपनी दलीलें पेश की, इस दौरान कोर्ट ने उनसे पूछा कि राम का जन्मस्थान कहां हैं? इस पर वकील ने कहा कि बाबरी मस्जिद का जहां गुंबद था उसी के नीचे। वकील ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे वाले स्थान को भगवान राम का जन्मस्थान माना है। वकील ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की तरफ से विवादित स्थल पर उनका मालिकाना हक साबित नहीं किया गया था।

बाबर ने ही मस्जिद बनाई तो सबूत कहा गए ?
रामलला के वकील को कोर्ट ने ये भी कहा कि जब कभी हिंदू पूजा करने की खुली छूट मांगते हैं तो ये विवाद शुरू हो जाता है। वकील वैद्यनाथन ने कहा कि मस्जिद से पहले उस स्थान पर मंदिर था उन्होंने कहा कि इसका कोई सबूत नहीं है कि बाबर ने ही वो मस्जिद बनाई थी। मुस्लिम पक्ष द्वारा ये दावा किया गया था कि उनके पास 438 साल से जमीन का अधिकार है, पर हाईकोर्ट ने भी उनकी इस दलील को नहीं माना था।

मध्यस्थता पैनल का गठन
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च को इस मामले को बातचीत से सुलझाने के लिए मध्यस्थता पैनल बनाया था। इसमें पूर्व जस्टिस एफएम कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर, सीनियर वकील श्रीराम पंचू शामिल थे। हालांकि, पैनल मामले को सुलझाने के लिए किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। इस पर सुप्रीम कोर्ट 6 अगस्त से नियमित को तैयार हुआ था।

हाईकोर्ट ने जमीन को 3 हिस्सों में बांटने का दिया था आदेश
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। पहला-सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा- निर्मोही अखाड़ा और तीसरा- रामलला विराजमान।

 

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(SPASHTAWAZ NEWS)